प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना और बहराइच जनपद के सीमांत कृषक: एक समाजशास्त्रीय मूल्यांकन
Raj Kumar Singh
Asst. Professor (Department of Sociology), Kalicharan P.G. College, Lucknow, Uttar Pradesh, India.
*Corresponding Author E-mail: rajeshsinghgrand@gmail.com
ABSTRACT:
यह शोध पत्र प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना (PM-KISAN) के संदर्भ में बहराइच जनपद के नानपारा एवं चित्तौरा विकास खंडों के सीमांत कृषकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का समाजशास्त्रीय मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में सीमांत कृषक ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सर्वाधिक संवेदनशील और निर्धन वर्ग हैं। यह वर्ग भूमि के अत्यंत छोटे जोतों पर निर्भर होता है, जिससे उनकी आय अस्थिर और सामाजिक स्थिति कमजोर बनी रहती है। इस परिप्रेक्ष्य में, वर्ष 2019 में प्रारंभ की गई प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना ने सीमांत कृषकों को प्रतिवर्ष ₹6000 की प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता प्रदान कर उन्हें आंशिक रूप से आर्थिक स्थिरता देने का प्रयास किया है।
अध्ययन का उद्देश्य यह समझना है कि यह योजना किस सीमा तक सीमांत कृषकों की आर्थिक स्थिति, सामाजिक सुरक्षा और जीवन स्तर में सुधार लाने में सफल रही है। सर्वेक्षण आधारित यह अध्ययन नानपारा और चित्तौरा ब्लॉक के 200 सीमांत कृषकों के अनुभवों और धारणाओं पर आधारित है। शोध से प्राप्त निष्कर्ष संकेत करते हैं कि योजना ने कृषकों की अल्पकालिक वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में सहायता दी है, किंतु दीर्घकालिक आर्थिक सशक्तिकरण अभी भी सीमित है। सामाजिक दृष्टि से यह योजना ग्रामीण कृषकों में ‘राज्य के प्रति भरोसे’ और ‘कल्याणकारी नीतियों की निर्भरता’ की भावना को सुदृढ़ करती है।
KEYWORDS: सीमांत कृषक, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना, बहराइच जनपद, समाजशास्त्रीय मूल्यांकन, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT), ग्रामीण ऋणग्रस्तता, सामाजिक सशक्तिकरण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था।
प्रस्तावना:-
भारत की अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि है और कृषि पर निर्भर जनसंख्या का एक बड़ा भाग सीमांत एवं लघु कृषकों के रूप में विद्यमान है। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन (NSSO, 2022) के अनुसार, देश के लगभग 86% कृषक सीमांत श्रेणी में आते हैं, जिनकी औसत जोत एक हेक्टेयर से भी कम है। यह वर्ग कृषि उत्पादन, विपणन, ऋण-सुविधा और तकनीकी संसाधनों की दृष्टि से सबसे अधिक असुरक्षित है।
ऐसे परिदृश्य में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना (पीएम-किसान) केंद्र सरकार द्वारा दिसंबर, 2018 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से शुरू की गई एक महत्वाकांक्षी योजना है, जिसका उद्देश्य देश के सभी भूमि धारक (पहले केवल लघु एवं सीमांत किसानों को ही शामिल किया गया था) किसानों (कुछ शतों के अधीन) को वित्तीय सहायता प्रदान करना है, ताकि वह कृषि से जुड़े खर्चों को पूरा कर सकें, साहूकारों के चंगुल से बचे रहें और अपनी आजीविका को सुचारू रूप से चला सकें। साथ ही यह योजना किसानों को साहूकारों से कर्ज लेने से बचाने में भी सहायक है। इसके तहत प्रति वर्ष ₹6000 की सहायता राशि तीन समान किस्तों में (प्रत्येक ₹2000) सीधे किसानों के बैंक खाते में ट्रांसफर की जाती है, जिससे लाभार्थियों को किसी प्रकार के बिचौलिया समस्या का सामना नहीं करना पड़ता है। यह योजना 100% केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित है, जिससे राज्य सरकारों पर कोई अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ता है।
तालिका 1: पीएम-किसान योजना के तहत कृषक वर्गीकरण
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कृषक श्रेणी |
भूमि धारिता मानदंड (हेक्टेयर) |
पात्रता की स्थिति (2020-25) |
PM-KISAN के तहत लाभ (प्रति परिवार) |
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सीमांत/लघु कृषक (SMF) परिवार |
2 हेक्टेयर तक |
पात्र |
₹6000 प्रति वर्ष (₹2000 x 3 किस्तें) |
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अन्य कृषक परिवार |
2 हेक्टेयर से अधिक |
पात्र (बहिष्करण मानदंडों के अधीन) |
₹6000 प्रति वर्ष (₹2000 x 3 किस्तें) |
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भूमिहीन श्रमिक |
कोई कृषि भूमि नहीं |
अपात्र |
कोई लाभ नहीं |
साहित्य समीक्षा:
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना पर किए गए विभिन्न अध्ययन इसके बहुआयामी प्रभावों को उजागर करते हैं, जो न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति बल्कि उनके कृषि व्यवहार और सामाजिक-आर्थिक लचीलेपन को भी प्रभावित कर रहे हैं। घोष एट अल. (2024) द्वारा किए गए एक कठोर अध्ययन में पाया गया कि बिहार और उत्तर प्रदेश के छोटे और सीमांत किसानों में, योजना के लाभार्थियों का आजीविका सूचकांक गैर-लाभार्थियों की तुलना में 3.34% से 4.13% अधिक था, जो प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण के सकारात्मक आय प्रभाव को स्थापित करता है (Ghosh et al., 2024)। इसी तरह, दक्षिण भारत के पांच राज्यों में 1900 किसानों पर किए गए एक बड़े सर्वेक्षण ने यह स्पष्ट किया कि लाभार्थी परिवार प्राप्त राशि का उपयोग मुख्यतः चार प्रमुख क्षेत्रों में करते हैं: कृषि निवेश, ऋण चुकौती, सामाजिक कार्य और घरेलू अनिवार्य व्यय। इस अध्ययन ने यह भी रेखांकित किया कि किस्त के वितरण का समय योजना की प्रभावशीलता का सबसे महत्वपूर्ण कारक है (K. et al., 2025)।
योजना के व्यापक आर्थिक प्रभावों को गौतम और रस्तोगी (2025) ने अपने पैनल डेटा विश्लेषण में दर्शाया, जिसमें 21 भारतीय राज्यों के आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकला कि PM-KISAN का कृषि उत्पादन और राज्यों के कर राजस्व पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि राशि को मुद्रास्फीति से जोड़ दिया जाए ताकि इसका वास्तविक मूल्य बना रहे (Gautam & Rastogi, 2025)। सरकारी स्तर पर, DMEO, NITI आयोग और IFPRI द्वारा किए गए एक बहु-आयामी मूल्यांकन में अत्यधिक उत्साहजनक परिणाम सामने आए, जिसमें 85% लाभार्थियों ने कृषि आय में वृद्धि की सूचना दी और 92% से अधिक ने राशि का उपयोग बीज और उर्वरक जैसे कृषि आगतों के लिए किया, जिससे ऋण पर उनकी निर्भरता में उल्लेखनीय कमी आई (Ministry of Agriculture & Farmers Welfare, 2025)।
दिलचस्प रूप से, योजना का प्रभाव केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित नहीं है। सैय्यद (2024) ने महाराष्ट्र के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए पाया कि PM-KISAN से लाभान्वित परिवारों ने MGNREGA के तहत काम के दिनों में औसतन 6 दिनों की कमी दर्ज की। यह प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण के कारण उत्पन्न "आय प्रभाव" को दर्शाता है, जहाँ किसानों को रोजगार गारंटी योजना पर निर्भर रहने की आवश्यकता कम हो गई (Saiyyad, 2024)। अंततः, उत्तर प्रदेश में किए गए एक कारक विश्लेषण ने यह स्पष्ट किया कि योजना को किसानों के आजीविका लचीलेपन को बढ़ाने में प्रभावी बनाने वाले तीन प्रमुख कारक हैं: कृषि विस्तार और नवाचार के प्रति किसानों का झुकाव, उनके पास उपलब्ध आर्थिक संसाधन और योजना के प्रति उनकी संज्ञानात्मक प्रतिक्रिया (Siddharth et al., 2025)।
इन सभी अध्ययनों का समग्र निष्कर्ष यही निकलता है कि PM-KISAN योजना ने किसानों की आय में वृद्धि, कृषि निवेश को बढ़ावा देने और ऋण निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साथ ही, इसने ग्रामीय परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा जाल का कार्य भी किया है, जैसा कि MGNREGA पर इसके प्रभाव से स्पष्ट होता है। हालाँकि, अध्ययनों में यह भी रेखांकित किया गया है कि इस योजना के लाभों को अधिकतम करने के लिए इसे मजबूत कृषि विस्तार सेवाओं, तकनीकी नवाचारों और क्षेत्र-विशिष्ट नीतियों के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता है (Gautam & Rastogi, 2025; Siddharth et al., 2025; Singh et al., 2025; Tripathi et al., 2023)।
यह अध्ययन उत्तर प्रदेश के बहराइच जनपद (सीमांत कृषकों की संख्या 84.47%) में स्थित नानपारा और चित्तौरा विकास खंडों पर केंद्रित है। दोनों ब्लॉक तराई क्षेत्र में स्थित हैं, जहाँ कृषि मुख्य आजीविका का साधन है। यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से उपजाऊ तो है, परंतु सिंचाई, पूंजी और तकनीक की कमी के कारण अधिकांश कृषक सीमांत और लघु किसान वर्ग में आते हैं।
(क) नानपारा ब्लॉक:
नानपारा क्षेत्र नेपाल सीमा के निकट स्थित है, जहाँ की आबादी विविध सामाजिक वर्गों जैसे अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग, मुस्लिम कृषक समुदाय और सामान्य जाति के छोटे किसानों से मिलकर बनी है। यहाँ की कृषि जोत अत्यंत सूक्ष्म (0.5 –1 हेक्टेयर औसत) है। अधिकांश किसान खरीफ फसल में धान और रबी में गेहूं की खेती करते हैं। सिंचाई के सीमित साधनों और पूंजी की कमी के कारण कृषि उत्पादन अस्थिर रहता है। पशुपालन और श्रमिक कार्य सहायक आय के स्रोत हैं।
(ख) चित्तौरा ब्लॉक:
चित्तौरा ब्लॉक बहराइच नगर क्षेत्र के समीप है, जहाँ कृषि भूमि की उपलब्धता सीमित और जनसंख्या घनत्व अपेक्षाकृत अधिक है। यहाँ कृषि पर निर्भर सीमांत कृषक परिवार अक्सर रोजगार की तलाश में आंशिक पलायन करते हैं। सिंचाई सुविधा सीमित होने के कारण वर्षा आधारित कृषि प्रमुख है।
इन दोनों ब्लॉकों का चयन इसलिए किया गया क्योंकि ये क्षेत्र न केवल सीमांत कृषकों की घनी आबादी रखते हैं, बल्कि PM-KISAN योजना के कार्यान्वयन में भौगोलिक और सामाजिक विविधता का प्रतिनिधित्व भी करते हैं।
इस शोध अध्ययन के निम्नलिखित विशिष्ट उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं —
1. बहराइच जनपद के नानपारा एवं चित्तौरा ब्लॉक के सीमांत कृषकों में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के प्रति जागरूकता के स्तर का अध्ययन करना।
2. योजना से प्राप्त आर्थिक सहायता का कृषकों की आय, ऋण स्थिति और कृषि निवेश पर प्रभाव जानना।
3. योजना के परिणामस्वरूप ग्रामीण ऋणग्रस्तता, साहूकारों पर निर्भरता और सामाजिक सशक्तिकरण (विशेषकर महिलाओं के संदर्भ में) पर पड़ने वाले प्रभावों का मूल्यांकन करना।
प्रस्तुत शोध पत्र अध्ययन विषय से संबंधित तथ्यों के संकलन एवं विश्लेषण पर आधारित है। इसमें बहराइच जनपद में स्थित नानपारा एवं चित्तौरा विकासखण्डों में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना से लाभान्वित होने वाले सीमांत कृषकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन किया गया है। न्यायदर्श के रूप में 200 सीमान्त कृषकों (प्रत्येक ब्लाक से 100 सीमांत कृषक) का चयन किया गया है। इस विधि के अंतर्गत प्रत्येक ब्लॉक से 5–5 ग्राम पंचायतों का चयन किया गया और प्रत्येक पंचायत से औसतन 20 सीमांत कृषकों को यादृच्छिक रूप से चुना गया। इस प्रकार अध्ययन में विभिन्न जातियों, वर्गों और आय समूहों का संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया।
प्रस्तुत शोध पत्र में सीमांत कृषकों से प्रत्यक्ष साक्षात्कार एवं प्रश्नावली के माध्यम से सूचना प्राप्त की गई। साथ ही द्वितीयक आँकड़े कृषि विभाग, ब्लॉक कार्यालय, जिला योजना समिति, भारत सरकार के PM-KISAN पोर्टल, सरकारी रिपोर्टों, जनगणना 2011 तथा विभिन्न शोध आलेखों से लिए गए तथा इसमें वर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक उपागम का उपयोग किया गया है।
तालिका 2: चयनित सीमांत कृषक परिवारों का जाति-आधारित वितरण (N=200)
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जाति समूह |
परिवारों की संख्या |
प्रतिशत (%) |
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अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) |
48 |
24% |
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अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) |
102 |
51% |
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सामान्य वर्ग (General) |
50 |
25% |
|
कुल |
200 |
100% |
प्रस्तुत तालिका चयनित 200 सीमांत कृषक परिवारों के जाति-आधारित वितरण को दर्शाती है। तालिका के अनुसार, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के परिवारों की संख्या सर्वाधिक है। कुल 200 परिवारों में से 102 परिवार (51%) OBC वर्ग से संबंधित हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि अध्ययन क्षेत्र में सीमांत कृषकों के बीच OBC समुदाय की प्रमुख उपस्थिति है। यह स्थिति भारतीय ग्रामीण समाज की उस संरचना को भी प्रतिबिंबित करती है, जहाँ अन्य पिछड़ा वर्ग कृषि एवं छोटे जोत वाले कृषकों के रूप में बड़ी संख्या में पाया जाता है।
तालिका के अनुसार अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) वर्ग के 48 परिवार (24%) सीमांत कृषक श्रेणी में आते हैं। यह प्रतिशत दर्शाता है कि सामाजिक रूप से वंचित और ऐतिहासिक रूप से पिछड़े समुदायों की भी सीमांत कृषि में उल्लेखनीय भागीदारी है। इसके अतिरिक्त सामान्य वर्ग के 50 परिवार (25%) इस अध्ययन में शामिल हैं। यद्यपि सामान्य वर्ग को अपेक्षाकृत सामाजिक एवं आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति वाला माना जाता है, फिर भी इस तालिका से स्पष्ट है कि इस वर्ग के कुछ परिवार भी सीमांत कृषि की श्रेणी में आते हैं। इसका अर्थ है कि कृषि भूमि का छोटा आकार और आर्थिक सीमाएँ केवल पिछड़े वर्गों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामान्य वर्ग के कुछ परिवार भी इस समस्या का सामना कर रहे हैं।
तालिका 3: चयनित लाभार्थियों का साक्षरता स्तर (N=200)
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साक्षरता स्तर |
लाभार्थी |
प्रतिशत (%) |
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निरक्षर |
55 |
27.5 |
|
प्राथमिक/माध्यमिक |
95 |
47.5 |
|
उच्च माध्यमिक/स्नातक |
50 |
25 |
|
कुल |
200 |
100% |
प्रस्तुत तालिका (N = 200) लाभार्थियों के साक्षरता स्तर का वितरण दर्शाती है, जिससे उनके शैक्षिक एवं सामाजिक विकास की स्थिति स्पष्ट होती है। आंकड़ों के अनुसार 27.5% लाभार्थी निरक्षर हैं, जो यह संकेत देता है कि योजना का एक बड़ा हिस्सा अभी भी ऐसे वर्ग तक पहुँच रहा है जो औपचारिक शिक्षा से वंचित है और जिन्हें सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त करने तथा प्रक्रियाओं को समझने में कठिनाई हो सकती है। सर्वाधिक 47.5% लाभार्थी प्राथमिक अथवा माध्यमिक स्तर तक शिक्षित हैं, जिससे स्पष्ट है कि अधिकांश लाभार्थी बुनियादी साक्षरता रखते हैं और वे योजना की सामान्य शर्तों एवं लाभों को समझने में सक्षम हैं, किंतु उच्च स्तरीय तकनीकी या प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उन्हें सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है। वहीं 25% लाभार्थी उच्च माध्यमिक या स्नातक शिक्षित हैं, जो अपेक्षाकृत जागरूक और सूचना तक बेहतर पहुँच रखने वाले वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा योजनाओं का अधिक प्रभावी उपयोग करने की क्षमता रखते हैं। समग्र रूप से देखा जाए तो तालिका यह दर्शाती है कि लाभार्थियों में निम्न एवं मध्यम शिक्षा स्तर का प्रभुत्व है, जबकि उच्च शिक्षित वर्ग अपेक्षाकृत कम है; अतः योजनाओं के क्रियान्वयन में सरल प्रक्रियाएँ, जागरूकता कार्यक्रम और स्थानीय स्तर पर मार्गदर्शन की व्यवस्था आवश्यक है, ताकि कम शिक्षित लाभार्थी भी योजनाओं का पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकें।
तालिका 4: चयनित लाभार्थियों को प्राप्त ₹2,000 की किश्त का उपयोग पैटर्न (N=200 लाभार्थी)
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उपयोग की मुख्य मद |
कृषकों का प्रतिशत (%) |
औसत उपयोग राशि (₹) |
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खाद्य उपभोग/घरेलू खर्च |
68% |
1200 |
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कृषि इनपुट (बीज, उर्वरक) |
22% |
800 |
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पुराने गैर-संस्थागत ऋण का भुगतान |
7% |
500 |
|
बच्चों की शिक्षा/स्वास्थ्य |
3% |
400 |
प्रस्तुत तालिका के अनुसार, 200 लाभार्थी किसानों द्वारा प्राप्त ₹2,000 की किश्त के उपयोग पैटर्न का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि अधिकांश धनराशि का उपयोग तत्काल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया गया है। सर्वाधिक 68% लाभार्थियों ने औसतन ₹1,200 खाद्य उपभोग एवं घरेलू खर्च पर किया, जो यह दर्शाता है कि अधिकांश कृषक परिवार आय की कमी और दैनिक जरूरतों के दबाव से जूझ रहे हैं तथा यह सहायता उनके लिए निवेश पूंजी न होकर जीविका सुरक्षा का साधन बन गई। वहीं, 22% किसानों ने कृषि इनपुट (बीज, उर्वरक) पर औसतन ₹800 खर्च कर कृषि कार्यों को बढ़ावा दिया, जिससे स्पष्ट है कि यह राशि खेती की वास्तविक लागत की तुलना में बहुत कम है और केवल आंशिक सहायता प्रदान कर पाती है। गौरतलब है कि लगभग 7% किसानों ने औसतन ₹500 पुराने गैर-संस्थागत ऋण के भुगतान में लगाया, जो ग्रामीण क्षेत्रों में साहूकार आधारित ऋण निर्भरता तथा ऋणग्रस्तता की स्थिति को प्रकट करता है; हालांकि छोटी राशि होने के कारण इससे केवल अस्थायी राहत ही मिल सकी। वहीं मात्र 3% किसानों ने औसतन ₹400 बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर व्यय किया, जो बताता है कि आर्थिक अभाव की स्थिति में परिवार दीर्घकालिक मानव पूंजी निवेश को प्राथमिकता नहीं दे पाते। यह पैटर्न बताता है कि लाभार्थियों की प्राथमिकता तत्काल उपभोग एवं आय सृजन के साधनों (जैसे कृषि निवेश) पर केंद्रित है, जबकि ऋण चुकौती और दीर्घकालिक मानव विकास (शिक्षा-स्वास्थ्य) पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है।
योजना के माध्यम से राज्य ने सीधे लाभार्थी तक नकद हस्तांतरण किया है, जिसे समाजशास्त्र में कल्याणकारी राज्य की एक व्यवहारिक अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। यह हस्तांतरण सीमांत कृषक वर्ग को राज्य आधारित सुरक्षा देने का यत्न है। सर्वेक्षण में अधिकांश कृषकों ने योजना को सकारात्मक रूप से देखा “कम-भूमि वाले कृषक हेतु यह एक न्यूनतम राहत है”, ऐसा व्यक्त हुआ। इससे यह संकेत मिलता है कि इस आर्थिक हस्तांतरण ने सामाजिक रूप से कृषक वर्ग के बीच प्राप्तकर्ता के रूप में राज्य-संबंध को मजबूत किया है।
हालाँकि योजना व्यापक है, लेकिन क्षेत्रीय अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि लाभ-प्राप्ति और उपयोग में जाति-वर्गीय एवं लिंग-आधारित असमानताएँ बनी हुई हैं। यह सामाजिक विभाजन सामाजिक संरचना के अंदर गहराई से छिपा है। उदाहरणस्वरूप SC/ST कृषक लाभ प्राप्ति में कम, सहायक जानकारी कम और दस्तावेजी अक्षमता अधिक पाये गए। यह तथ्य समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से दिखाता है कि आर्थिक सहायता मात्र भूमि-स्वामित्व, पहुँच-साधन एवं सामाजिक-नेटवर्क वाले कृषकों को अधिक लाभ पहुँचा पाती है, जबकि सबसे कमजोर वर्गों को प्रक्रियात्मक जटिलताएँ झेलनी पड़ती हैं।
सर्वेक्षण के अनुसार यधपि योजना ने अल्पकालिक वित्तीय राहत दी है जैसे कि ऋण चुकाना या इनपुट खरीदना, लेकिन दीर्घकालिक आर्थिक सशक्तिकरण या खेती के इतर आजीविकाओं के संदर्भ में प्रभाव सीमित रहा। इससे यह स्पष्ट है कि नकद हस्तांतरण से राज्य-निर्भरता की भावना तो बढ़ सकती है, पर आत्मनिर्भरता की दिशा में पर्याप्त प्रेरणा और संरचना नहीं बन पा रही। यह मान सकते हैं कि इस योजना ने वित्तीय सुरक्षा का एक न्यूनतम स्तर प्रस्तुत किया है, किंतु सामाजिक स्थिति में संरचनात्मक परिवर्तन (जैसे भूमि वितरण, सिंचाई सुविधा, वैकल्पिक रोजगार, तकनीकी प्रशिक्षण) के बिना सीमांत कृषक वर्ग की वास्तविक सशक्तिकरण संभव नहीं हो रही।
यह अध्ययन बहराइच जनपद के नानपारा एवं चित्तौरा विकास खंडों के सीमांत कृषकों के संदर्भ में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना का समाजशास्त्रीय मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। शोध से स्पष्ट होता है कि योजना ने सीमांत कृषकों को अल्पकालिक आर्थिक सहारा प्रदान किया है। प्राप्त राशि का अधिकांश भाग घरेलू उपभोग और दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति में व्यय हुआ, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह योजना मुख्यतः जीवन-निर्वाह की सुरक्षा सुनिश्चित करने का कार्य कर रही है। कृषि निवेश और ऋण चुकौती में भी आंशिक सहायता मिली, किंतु यह सहयोग सीमित स्तर तक ही प्रभावी रहा।
अध्ययन के उद्देश्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि योजना ने आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार अवश्य किया है, विशेष रूप से उपभोग स्तर और सीमित ऋण निर्भरता में कमी के रूप में। फिर भी दीर्घकालिक आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में इसका प्रभाव पर्याप्त नहीं पाया गया। सहायता राशि खेती की बढ़ती लागत और ग्रामीण आर्थिक चुनौतियों की तुलना में कम सिद्ध होती है।
सामाजिक दृष्टि से योजना ने कृषकों में राज्य के प्रति विश्वास और संस्थागत जुड़ाव की भावना को सुदृढ़ किया है। कुछ कृषकों ने सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि का अनुभव भी व्यक्त किया, जो योजना के प्रतीकात्मक महत्व को दर्शाता है। तथापि जाति, वर्ग और शिक्षा के आधार पर लाभ प्राप्ति और उपयोग में असमानताएँ विद्यमान रहीं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की प्रक्रिया सामाजिक संरचनात्मक बाधाओं को पूर्णतः समाप्त नहीं कर पाती।
समग्र रूप से कहा जा सकता है कि यह योजना सीमांत कृषकों के लिए एक न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा तंत्र के रूप में प्रभावी है, परंतु स्थायी आर्थिक सशक्तिकरण हेतु इसे कृषि अवसंरचना, तकनीकी सहायता, जागरूकता कार्यक्रमों तथा वंचित वर्गों के लिए सरल प्रक्रियाओं के साथ समन्वित करना आवश्यक है। भविष्य में दीर्घकालिक और तुलनात्मक अध्ययनों के माध्यम से इसके व्यापक सामाजिक प्रभावों का और अधिक विश्लेषण किया जाना चाहिए।
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15. द प्रिंट. (2024). सीमांत किसानों की फसलें जलवायु परिवर्तन के कारण नष्ट हुईं, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) आंशिक रूप से मददगार साबित हो रहा है। https://theprint.in/agriculture/marginal-farmers-consistently-lost-over-50-crops-in-past-5-yrs-due-to-extreme-climate-conditions/2149657/
16. आईएफपीआरआई (2022). प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) भारतीय किसानों की आय दोगुनी करने में सहायक हो सकता है। https://www.ifpri.org/blog/direct-benefit-transfers-can-help-double-indian-farmers-income-2022-2023
17. पीएम-किसान आधिकारिक पोर्टल. (2025). प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना का विवरण एवं लाभार्थियों के आँकड़े। https://pmkisan.gov.in
18. एनएसएसओ (2022). भूमि जोत का स्वरूप एवं छोटे/सीमांत किसानों के आँकड़े।सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, भारत सरकार।
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Received on 07.04.2026 Revised on 28.04.2026 Accepted on 18.05.2026 Published on 06.06.2026 Available online from June 10, 2026 Int. J. Ad. Social Sciences. 2026; 14(2):111-116. DOI: 10.52711/2454-2679.2026.00023 ©A and V Publications All right reserved
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